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तजुर्बा

3:10 am, Posted by दास्तानें, No Comment

एक साल मैं बल्ख से वामिया जा रहा था। रास्ते में डाकुओं का खतरा था। हमारे आगे एक नौजवान चल रहा था। वह हथियारों से लैस था। दुनिया का कोई पहलवान उसकी कमर को जमीन पर नहीं लगा सकता था। मगर उसने न जमाना देख रखा था, न बहादुरों के नक्कारे की कड़क उसके कानों में पड़ी थी और न सवारों की तलवारों की चमक उसने देखी थी। न कभी वह दुश्मन के हाथ कैदी बना था। मैं और वह जवान आगे-पीछे चल रहे थे। जो पुरानी दीवार सामने आती, उसे वह बाजुओं के जोर से गिरा देता और जो पेड़ रास्ते में आता, उसे वह अपने पंजे की ताकत से उखाड़ देता और घमंड के साथ कहता, 'हाथी कहां है? आकर मेरे बाजुओं की ताकत को देखे! शेर कहां है? वह मर्दों के पंजों का जोर तो देखे!'
हम इसी तरह चले जा रहे थे कि एक पत्थर के पीछे से दो डाकुओं ने सिर उभारा और हमसे लड़ने को तैयार हो गए। उनमें से एक के हाथ में एक लकड़ी थी और दूसरे के हाथ में एक मोंगरी। मैंने जवान से कहा, 'देखता क्या है? दुश्मन आ गए! जो जवांमर्दी और ताकत तुझमें हो, दिखा।' मैंने देखा कि जवान के हाथ से तीर-कमान गिर पड़ा और उसकी हड्डियों में कंपकंपी पैदा हो गई। फिर मेरे लिए सिवा इसके कोई चारा न रहा कि मैं जान बचाकर भाग जाऊं।
बड़े कामों के लिए तजुर्बेकार को भेज, जो खूंखार शेर को भी अपनी अक्ल से कमन्द में फांस लाए। जवान कितना भी ताकतवर क्यों न हो, दुश्मन से लड़ते वक्त डर के मारे उसके सब जोड़ हिल जाते हैं। तजुर्बेकार आदमी लड़ाई के हुनर को जानता है।     - शेख सादी

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